फ़िल्म समीक्षा: दृश्यम- द कन्क्लूजन

दृश्यम फ्रेंचाइज़ी की सबसे बड़ी ताकत शुरुआत से ही इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले रहे हैं। पहली फिल्म ने दर्शकों को अपनी कहानी से जोड़ा, दूसरी फिल्म ने उसी कहानी को आगे बढ़ाते हुए फ्रेंचाइज़ी को और मजबूत किया और अब दृश्यम 3: द कन्क्लूजन उसी सफर को उसके अंतिम पड़ाव तक लेकर जाती है। फिल्म को देखने के बाद सबसे ज्यादा जो बात प्रभावित करती है, वह है इसकी पटकथा। यह सिर्फ अजय देवगन या किसी एक कलाकार की फिल्म नहीं है। यह लेखक-निर्देशक अभिषेक पाठक की फिल्म है, जहां स्क्रिप्ट सबसे बड़ा हीरो बनकर सामने आती है।
स्क्रिप्ट है असली ताकत
दृश्यम 3 इस बात का अच्छा उदाहरण है कि एक मजबूत स्क्रिप्ट किसी फिल्म को कितना प्रभावी बना सकती है।
फ्रेंचाइज़ी के दर्शक पहले से ही इसके किरदारों और दुनिया से जुड़े हुए हैं। ऐसे में कहानी को आगे बढ़ाना आसान नहीं था। लेकिन फिल्म में नए किरदारों को शामिल करते हुए कहानी को जिस तरह आगे बढ़ाया गया है, वह इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
जयदीप अहलावत ने अपने किरदार को प्रभावी ढंग से निभाया है। हालांकि यहां सिर्फ अभिनेता के प्रदर्शन की बात करना पूरी तस्वीर नहीं होगी। किरदार की ताकत उसके लेखन से आती है। इंटरवल तक उनके किरदार को जिस तरह स्थापित किया गया है, उससे कहानी में तनाव लगातार बना रहता है।
अजय देवगन का विजय सलगांवकर का किरदार कम बोलता है, लेकिन जब बोलता है तो उसका असर दिखाई देता है।
पहली और दूसरी फिल्म के बाद अब ऐसा लगता है कि अजय इस किरदार को निभाने के बजाय उसे जीते हुए दिखाई देते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद बोलने का तरीका और किरदार की चुप्पी—सब कुछ विजय सलगांवकर की स्थापित छवि के अनुरूप है।
यहां कोई बहुत अलग या चौंकाने वाली एक्टिंग देखने को नहीं मिलती, लेकिन शायद इस किरदार को इसकी जरूरत भी नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसका संयम है।
इंटरवल के बाद बदलता है फोकस
फिल्म का पहला हिस्सा जयदीप अहलावत के किरदार को मजबूती से स्थापित करता है। इंटरवल के बाद कहानी का फोकस धीरे-धीरे अजय देवगन के किरदार और उसके अगले कदमों की तरफ बढ़ता है। क्लाइमैक्स को लेकर दर्शकों की कुछ उम्मीदें पहले से हो सकती हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि फिल्म वहां तक कैसे पहुंचती है। यही वह हिस्सा है जहां लेखन अपनी पकड़ दिखाता है।
फिल्म कहानी के ट्विस्ट या अंत को सिर्फ चौंकाने के लिए इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि पूरे घटनाक्रम को धीरे-धीरे उस मुकाम तक पहुंचाती है जहां दर्शक जाना चाहते हैं।
इसी वजह से फिल्म का प्लॉट या क्लाइमैक्स बताना इस review के उद्देश्य के खिलाफ होगा। दृश्यम जैसी फिल्म में मंजिल से ज्यादा उस तक पहुंचने का सफर महत्वपूर्ण होता है।
मास और क्लास का संतुलन
दृश्यम 3 की एक और खासियत इसका मास और क्लास के बीच संतुलन है।
फिल्म आम दर्शक को भी जोड़कर रखती है और कहानी के स्तर पर गंभीर दर्शक को भी पर्याप्त सामग्री देती है। यह संतुलन बनाना आसान नहीं होता, लेकिन जब किसी फिल्म में यह सही बैठता है तो उसका असर बॉक्स ऑफिस से लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया तक दिखाई देता है।
फिल्म की लंबाई भी इसकी कहानी के हिसाब से संतुलित लगती है और लगभग सवा दो घंटे तक यह दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने में सफल रहती है।
फिल्म में गानों की कोई खास भूमिका नहीं है और कहानी को इसकी जरूरत भी महसूस नहीं होती। बैकग्राउंड में संगीत का इस्तेमाल कहानी के माहौल को बनाए रखने के लिए किया गया है।
एक्टिंग की बात करें तो यहां कोई एक कलाकार ऐसी परफॉर्मेंस नहीं देता जिसे पूरी फिल्म की मास्टरक्लास कहा जाए। लेकिन यही इस फिल्म की खूबसूरती है—स्क्रिप्ट इतनी मजबूत है कि पूरी कास्ट का काम प्रभावी दिखाई देता है।
सबसे बड़ा प्लस पॉइंट
फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका The Conclusion होना है। फ्रेंचाइज़ी को सिर्फ आगे बढ़ाते रहने के बजाय कहानी को एक मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि फिल्म का अंत एक स्वाभाविक पड़ाव जैसा महसूस होता है।
दृश्यम की पूरी यात्रा को देखते हुए यह बात महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी सफल फ्रेंचाइज़ी को सही समय पर उचित निष्कर्ष देना उतना ही मुश्किल है जितना उसे सफल बनाना।
देखें या न देखें
दृश्यम 3: द कन्क्लूजन की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका स्टारकास्ट नहीं, बल्कि इसकी मजबूत पटकथा और कहानी को संभालने का तरीका है। फिल्म ट्विस्ट और कहानी को खोलने के बजाय दर्शकों को उसके सफर में शामिल करती है। अजय देवगन और जयदीप अहलावत का प्रभावी इस्तेमाल, अभिषेक पाठक का निर्देशन और सबसे बढ़कर मजबूत लेखन फिल्म को बांधे रखते हैं
यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि सिनेमा में असली हीरो अक्सर अभिनेता नहीं, बल्कि एक अच्छी कहानी और मजबूत पटकथा होती है। मेरी रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5) ~गोविन्द परिहार (05.10.26)

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